“गर्म आलू” बना लद्दाख संकट: जब चीनी टैंकों के सामने फैसला लेने से पीछे हट गई सरकार
रिपोर्ट | राजेश सिंह
नई दिल्ली। पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की किताब “फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी” में दर्ज एक सनसनीखेज खुलासा आज संसद से लेकर सियासत तक भूचाल ला रहा है। यही वह अंश है, जिसे कांग्रेस नेता राहुल गांधी संसद में पढ़ना चाहते थे, लेकिन सत्ता पक्ष के भारी हंगामे के बीच सदन की कार्यवाही स्थगित कर दी गई।
किताब के अनुसार, 31 अगस्त 2020 की रात पूर्वी लद्दाख के रेचिन ला क्षेत्र में हालात बेहद गंभीर हो गए थे। भारतीय सेना के नॉर्दर्न कमांड प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल योगेश जोशी को रात 8:15 बजे सूचना मिली कि चार चीनी टैंक एक खड़ी पहाड़ी के रास्ते भारतीय ठिकानों की ओर बढ़ रहे हैं। यह इलाका कैलाश रेंज का हिस्सा था, जिस पर भारतीय सेना ने कुछ ही घंटे पहले रणनीतिक बढ़त हासिल की थी।
स्थिति की गंभीरता को समझते हुए जनरल जोशी ने तत्काल सेना प्रमुख जनरल नरवणे को जानकारी दी। चीनी टैंक भारतीय मोर्चों से महज़ कुछ सौ मीटर की दूरी पर थे। भारतीय सैनिकों ने चेतावनी के तौर पर इल्यूमिनेटिंग राउंड दागा, लेकिन चीनी टैंकों की गति नहीं रुकी।
इसके बाद जनरल नरवणे ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत और विदेश मंत्री एस. जयशंकर से लगातार संपर्क किया। नरवणे लिखते हैं कि उनका एक ही सवाल था—
“मेरे लिए आदेश क्या हैं?”
मौजूदा प्रोटोकॉल के तहत बिना राजनीतिक मंज़ूरी गोली चलाने की अनुमति नहीं थी, लेकिन ऊपर से कोई स्पष्ट निर्देश नहीं मिल रहे थे। रात 9:10 बजे तक चीनी टैंक दर्रे से एक किलोमीटर से भी कम दूरी पर पहुंच चुके थे। 9:25 बजे नरवणे ने फिर रक्षा मंत्री को फोन किया, लेकिन आदेश फिर भी नहीं आए।
इसी दौरान PLA कमांडर मेजर जनरल लियू लिन का संदेश आया, जिसमें दोनों पक्षों के रुकने और अगले दिन बातचीत का प्रस्ताव था। यह एक संभावित समाधान लग रहा था, लेकिन कुछ ही देर बाद साफ हो गया कि चीनी टैंक रुक नहीं रहे हैं। रात 10 बजे तक वे टॉप से मात्र 500 मीटर दूर थे।
लेफ्टिनेंट जनरल योगेश जोशी ने स्पष्ट कहा कि चीनी सेना को रोकने का एकमात्र तरीका मीडियम आर्टिलरी से फायरिंग है, जो पूरी तरह तैयार थी और केवल आदेश का इंतज़ार कर रही थी। पाकिस्तान के साथ एलओसी पर ऐसे फैसले स्थानीय कमांडर रोज़ लेते हैं, लेकिन चीन के मामले में स्थिति बेहद संवेदनशील थी।
नरवणे लिखते हैं कि वे एक तरफ फील्ड कमांडरों के दबाव और दूसरी तरफ राजनीतिक नेतृत्व की चुप्पी के बीच फंसे हुए थे। अंततः रात 10:30 बजे रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का फोन आया। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात हो चुकी है और उनका निर्देश सिर्फ एक वाक्य में था—
“जो उचित समझो, वह करो।”
जनरल नरवणे के शब्दों में,
“यह पूरी तरह एक सैन्य फैसला बना दिया गया। मुझे एक ‘गर्म आलू’ पकड़ा दिया गया था और अब पूरी जिम्मेदारी मुझ पर थी।”
राजनीतिक गलियारों में आरोप लग रहे हैं कि इसी असहज सच्चाई को छिपाने के लिए संसद में सत्ता पक्ष ने भारी हंगामा किया। विपक्ष का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे गंभीर मुद्दे पर जवाबदेही से बचने के लिए सदन को जानबूझकर बाधित किया गया।
अब सवाल यह है कि जब देश युद्ध के कगार पर था, तब अंतिम फैसला लेने की जिम्मेदारी किसकी थी—और क्या उसे निभाया गया?
