गोवर्धन पूजा (अन्नकूट) का महत्व और संदेश
✍ धीरेंद्र सिंह (धीरू)
दीपावली के अगले दिन मनाया जाने वाला गोवर्धन पूजा भारतीय संस्कृति और श्रद्धा का एक प्रमुख पर्व है, जिसे अन्नकूट उत्सव भी कहा जाता है। यह दिन भगवान श्रीकृष्ण की गोवर्धन लीला की स्मृति में मनाया जाता है और प्रकृति तथा गौमाता के प्रति आभार व्यक्त करने का प्रतीक है।
कब मनाई जाती है गोवर्धन पूजा:
हिन्दू पंचांग के अनुसार यह पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाया जाता है। दीपावली के अगले दिन पड़ने वाला यह पर्व वर्ष 2025 में 22 अक्टूबर को मनाया जाएगा।
पौराणिक कथा:
द्वापर युग में ब्रजवासी हर वर्ष देवराज इंद्र की पूजा करते थे ताकि वर्षा ठीक से हो। श्रीकृष्ण ने उन्हें समझाया कि असली पालनकर्ता इंद्र नहीं, बल्कि गोवर्धन पर्वत है जो पशुओं को घास, जल और जीवन देता है। कृष्ण की प्रेरणा से ब्रजवासियों ने गोवर्धन की पूजा की, जिससे क्रोधित इंद्र ने मूसलाधार वर्षा कर दी। तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर सबकी रक्षा की। सात दिन बाद इंद्र ने अपनी गलती मानी और तब से यह पर्व कृष्ण की लीला और गोवर्धन के प्रति कृतज्ञता के रूप में मनाया जाने लगा।
पूजा विधि और महत्व:
इस दिन घर के आंगन में गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाकर उसे फूलों से सजाया जाता है। गायों की पूजा, भोजन और श्रृंगार किया जाता है। विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाकर भगवान कृष्ण को अर्पित किए जाते हैं, जिसे अन्नकूट भोग कहा जाता है। गोवर्धन की सात परिक्रमा कर आरती और प्रसाद का वितरण किया जाता है।
यह पर्व हमें सिखाता है कि प्रकृति, पशु-पक्षी और पर्यावरण हमारे जीवन के अभिन्न अंग हैं। गोवर्धन पूजा न केवल भक्ति का प्रतीक है, बल्कि सह-अस्तित्व, कृतज्ञता और समृद्धि का संदेश भी देती है।


