लोकसभा में नीरज मौर्य के ‘निपुण भारत’ सवालों पर सरकार के जवाब अधूरे
आकांक्षी जिलों की जमीनी हकीकत पर आंकड़ों से बचती दिखी सरकार, संसदीय क्षेत्रवार जवाबदेही नहीं
रिपोर्ट/सत्य प्रकाश
नई दिल्ली।लोकसभा में सांसद नीरज मौर्य द्वारा पूछे गए तारांकित प्रश्न के जवाब में केंद्र सरकार का निपुण भारत मिशन को लेकर दिया गया उत्तर अधूरा और सामान्य नीतिगत विवरणों तक सीमित रहा। सांसद ने कक्षा तीन तक बच्चों में मूलभूत साक्षरता और संख्यात्मक ज्ञान (FLN) सुनिश्चित करने के सरकारी दावों की वास्तविक प्रगति पर सवाल उठाते हुए उत्तर प्रदेश के आंवला (बरेली), शाहजहांपुर, बदायूं और जौनपुर जैसे सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े और आकांक्षी जिलों की स्थिति जाननी चाही थी।
सरकार ने अपने जवाब में बताया कि निपुण भारत मिशन को राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत देशभर में लागू किया गया है। मंत्रालय ने विद्या प्रवेश, जादुई पिटारा, बहुभाषी प्राइमर, शिक्षक प्रशिक्षण, डिजिटल निगरानी तंत्र, अपार आईडी और डेटा आधारित मॉनिटरिंग जैसे कार्यक्रमों की लंबी सूची गिनाई। हालांकि सांसद के सवाल से यह भी स्पष्ट हुआ कि सरकार जिलावार और संसदीय क्षेत्रवार प्रगति को स्पष्ट जवाबदेही के साथ प्रस्तुत करने से बचती नजर आई।
सरकार ने परख राष्ट्रीय सर्वेक्षण 2024 के हवाले से यह जरूर बताया कि बरेली (आंवला), बदायूं और शाहजहांपुर में कक्षा तीन के छात्रों का भाषा में प्रदर्शन अपेक्षाकृत बेहतर रहा, लेकिन सांसद के प्रश्न का मूल उद्देश्य यह जानना था कि जहां चुनौतियां अधिक हैं, वहां अतिरिक्त संसाधन और विशेष सहायता क्यों नहीं दी जा रही। इस अहम मुद्दे पर सरकार का जवाब सामान्य नीतिगत बयानों से आगे नहीं बढ़ पाया।
सांसद नीरज मौर्य ने कहा कि डिजिटल प्लेटफॉर्म और डेटा मॉनिटरिंग का हवाला तो दिया गया, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया कि कमजोर प्रदर्शन वाले स्कूलों और जिलों में ठोस सुधार कब और कैसे होगा। न ही यह बताया गया कि सीखने में पिछड़ रहे बच्चों के लिए अब तक कौन-कौन से विशेष हस्तक्षेप किए गए हैं।
उन्होंने सरकार से यह भी पूछा कि क्या कोई ठोस आंकड़ा मौजूद है जिससे यह पता चले कि निपुण भारत मिशन के जरिए अब तक कितने बच्चों को वास्तव में स्कूल से जोड़ा गया, उनमें से कितनों का कक्षा-1 में बिना बाधा प्रवेश सुनिश्चित हुआ, और क्या इस प्रशिक्षण व कार्यक्रमों का बच्चों की पढ़ाई और सीखने के स्तर पर स्पष्ट असर पड़ा है।
सरकार इन सवालों पर संख्यात्मक और परिणाम आधारित जवाब देने में नाकाम रही।
