हाईकोर्ट का सख्त संदेश: ‘सर तन से जुदा’ जैसे नारे संविधान और संप्रभुता पर हमला, नदीम को जमानत से इनकार।
रिपोर्ट/राजेश सिंह
बरेली।इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरेली में भड़की सांप्रदायिक हिंसा और धार्मिक उकसावे के गंभीर मामले में मौलाना तौकीर रज़ा के करीबी बताए जा रहे नदीम को जमानत देने से दो टूक इनकार कर दिया है। अदालत ने अपने कठोर और नजीर बनने वाले आदेश में साफ कहा कि “गुस्ताख-ए-नबी की एक सजा, सर तन से जुदा” जैसे नारे न सिर्फ आपराधिक कृत्य हैं, बल्कि ये भारतीय संविधान, कानून-व्यवस्था और देश की संप्रभुता पर सीधा हमला हैं। कोर्ट ने टिप्पणी की कि ऐसे नारों और गतिविधियों को किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
धारा 163 की अवहेलना, 5000 की भीड़ और खुलेआम मौत का नारा
हाईकोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक, 26 सितंबर को बरेली में धारा 163 लागू होने के बावजूद नमाज के बाद बिहारीपुर इलाके में 5000 से अधिक लोगों की भीड़ एकत्र की गई। इस भीड़ ने सरकार विरोधी नारे लगाए और खुलेआम मौत की सजा का ऐलान करते हुए “सर तन से जुदा” जैसे भड़काऊ नारे उछाले। अदालत ने इसे सुनियोजित तरीके से हिंसा भड़काने, धार्मिक उन्माद फैलाने और कानून को ठुकराने की बेशर्म कोशिश करार दिया।
पुलिस कार्रवाई पर हमला, हालात बने युद्ध जैसे
कोर्ट ने आदेश में कहा कि जब पुलिस ने गैरकानूनी जमावड़ा हटाने का प्रयास किया, तो हालात युद्ध जैसे हो गए। भीड़ ने पुलिसकर्मियों पर जानलेवा हमला किया, उनकी लाठियां छीनी गईं, वर्दी फाड़ दी गई। इसके बाद भारी पत्थरबाजी हुई, पेट्रोल बम फेंके गए और फायरिंग तक की गई। इस हिंसा में कई पुलिसकर्मी घायल हुए, जबकि सरकारी और निजी संपत्तियों को भी भारी नुकसान पहुंचा।
राज्य की सत्ता को खुली चुनौती
हाईकोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह महज कानून-व्यवस्था का मामला नहीं, बल्कि राज्य की सत्ता को खुली चुनौती देने जैसा कृत्य है। अदालत ने माना कि आरोपी की भूमिका प्रथम दृष्टया गंभीर है और उसे जमानत देने से समाज में गलत संदेश जाएगा।
देशभर के लिए नजीर
अदालत ने अपने फैसले में यह भी रेखांकित किया कि इस तरह के नारे और हिंसक गतिविधियां अभिव्यक्ति की आज़ादी के दायरे में नहीं आतीं। न्यायालय का यह आदेश देशभर के लिए स्पष्ट संदेश है कि कोई भी व्यक्ति या समूह कानून से ऊपर नहीं है और धार्मिक उकसावे के नाम पर हिंसा फैलाने वालों के साथ सख्ती से निपटा जाएगा।
