Saturday, April 18, 2026
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रामपुर के बच्चे चाकू नहीं, कलम उठाएं आजम खान की जौहर यूनिवर्सिटी बनी मिशाल, अखिलेश यादव ने पेन देकर जताया सम्मान”

रामपुर के बच्चे चाकू नहीं, कलम उठाएं आजम खान की जौहर यूनिवर्सिटी बनी मिशाल, अखिलेश यादव ने पेन देकर जताया सम्मान”

रिपोर्ट-कार्यालय संवादाता

रामपुर-उत्तर प्रदेश की राजनीति में अगर किसी नेता को संघर्ष, शिक्षा और स्वाभिमान का पर्याय कहा जाए तो वह नाम है आजम खान। कभी सड़कों पर आवाज़ उठाने वाला यह नेता आज भी अपने विचारों और कर्मों से बहस के केंद्र में रहता है। रामपुर की ज़मीन पर उन्होंने जो “जौहर यूनिवर्सिटी” खड़ी की, वह सिर्फ एक इमारत नहीं बल्कि एक विचार है एक ऐसा विचार जो कहता है कि रामपुर का कोई भी बच्चा चाकू नहीं, सिर्फ कलम उठाए।

अखिलेश यादव ने भेंट की पेन — शिक्षा को समर्पित भाव का प्रतीक

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव बुधवार को रामपुर पहुंचे। यह मुलाकात सिर्फ राजनीतिक नहीं थी, बल्कि भावनात्मक भी थी। अखिलेश यादव अपने साथ एक पेन (कलम) लेकर आए यह उपहार उन्होंने आजम खान को दिया। इस प्रतीकात्मक तोहफे ने सबका ध्यान खींचा।

जब देशभर में नेता सत्ता के शिखर पर पहुंचने के लिए सत्ता और सुरक्षा का प्रदर्शन करते हैं हेलीकॉप्टर, काफिला, बंदूकें और बड़े मकानों का भौकाल दिखाते हैं वहीं आजम खान अब भी कलम और किताब के शौकीन हैं। यही फर्क उन्हें बाकी नेताओं से अलग करता है।

आजम खान: नेता नहीं, शिक्षाविद बनने का सपना

राजनीति में लंबा सफर तय करने के बावजूद आजम खान हमेशा खुद को शिक्षाविद के रूप में देखना चाहते हैं। उन्होंने जौहर यूनिवर्सिटी के रूप में एक ऐसी संस्था बनाई जो शिक्षा और समाज सुधार का प्रतीक बन चुकी है।

उनका सपना था कि रामपुर के गरीब, पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदाय के बच्चे हाथ में किताब पकड़ें, विज्ञान और विचार की दुनिया में कदम रखें न कि सड़कों पर भटकें या नफरत की राजनीति में उलझें।

आज जौहर यूनिवर्सिटी विश्वस्तरीय शिक्षा का केंद्र बन चुकी है, जहां हजारों छात्र-छात्राएं पढ़ाई कर रहे हैं।

मुकदमों की झड़ी, मगर हिम्मत अडिग

आजम खान पर कभी मुर्गी चोरी से लेकर सरकारी ज़मीन कब्जे तक के 114 मुकदमे दर्ज हुए। उनके पूरे परिवार पर करीब 350 केस तक दर्ज हुए। मगर उन्होंने हर बार यही कहा “मेरी सबसे बड़ी गलती यह है कि मैंने शिक्षा को हथियार बनाया।”
दरअसल, जौहर यूनिवर्सिटी के निर्माण के बाद से ही राजनीतिक विरोधियों ने इसे निशाने पर रखा। कभी ज़मीन के नाम पर, कभी प्रशासनिक तकनीकी वजहों से, आजम खान और उनकी यूनिवर्सिटी लगातार जांचों और मुकदमों से घिरी रही।
फिर भी उन्होंने न तो अपने सिद्धांत छोड़े, न ही रामपुर छोड़ने का विचार किया।

‘अंधेर नगरी’ में सत्ता का दुरुपयोग इतिहास याद रखेगा

उत्तर प्रदेश की राजनीति में आजम खान का संघर्ष सिर्फ व्यक्तिगत नहीं बल्कि प्रतीकात्मक भी है। उन्होंने सत्ता के उस दुरुपयोग को झेला जो शायद किसी और नेता ने इतनी गहराई से नहीं झेला होगा।
“अंधेर नगरी” के इस दौर में जब राजनीतिक विरोध को एजेंसियों और मुकदमों से कुचलने की कोशिश की जा रही है, तब आजम खान का संघर्ष आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सबक है कि सच्ची लड़ाई आवाज़ और विचार से लड़ी जाती है, न कि हथियारों से।

अखिलेश और आजम: राजनीति से परे रिश्ता

अखिलेश यादव और आजम खान का रिश्ता हमेशा उतार-चढ़ाव भरा रहा है। लेकिन इस मुलाकात ने साबित किया कि उनके बीच सिर्फ राजनीति नहीं, एक भावनात्मक जुड़ाव भी है।
रामपुर में जब अखिलेश ने आजम खान से मुलाकात की, तो उन्होंने कहा —

“आजम साहब ने जो काम शिक्षा के लिए किया है, उसे इतिहास याद रखेगा। जिस दौर में राजनीति का मतलब सिर्फ सत्ता है, उस दौर में उन्होंने समाज को सोच दी है।”

यह मुलाकात ऐसे समय पर हुई जब आजम खान कई कानूनी और राजनीतिक मुश्किलों में घिरे हैं। अखिलेश यादव की यह भेंट उनके मनोबल को मजबूत करने का प्रयास मानी जा रही है।

आजम खान: शब्दों का शिल्पकार, विचारों का योद्धा

अगर उत्तर प्रदेश में कोई नेता है जो शब्दों की ताकत से राजनीति करता है, तो वह आजम खान हैं। उनके भाषण, उनकी भाषा, उनका व्यंग्य — सब में एक अलग किस्म की बौद्धिकता झलकती है।
वो सिर्फ राजनीति नहीं करते, बल्कि “शात्रार्थ” करते हैं — तर्क से, विचार से और दृढ़ता से। यही कारण है कि आज भी उन्हें सुनना अपने आप में एक अनुभव है।

समापन: कलम की ताकत सबसे बड़ी

रामपुर की मिट्टी से निकले इस नेता ने यह साबित किया कि कलम की ताकत तलवार से कहीं बड़ी होती है।
आजम खान का जीवन संघर्ष, शिक्षा और स्वाभिमान की कहानी है।
अखिलेश यादव का पेन उपहार इस कहानी का नया अध्याय जोड़ता है यह संदेश देता है कि राजनीति में भी विचार और शिक्षा की जगह अब भी बाकी है।

जब भविष्य में उत्तर प्रदेश की राजनीति का इतिहास लिखा जाएगा, तो उसमें यह जरूर लिखा जाएगा कि

“एक दौर था जब सत्ता के सामने आजम खान जैसे लोग कलम लेकर खड़े थे — और सत्ता के इस अंधकार में भी उन्होंने शिक्षा की लौ जलाए रखी।”

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