
पहली बार बरेली में नहीं निकला जुलूस-ए-गौसिया, अहसन मियां की सदारत में गौस-ए-पाक की याद में सजी महफ़िल
फिरोज खान भास्कर टुडे
ब्यूरो रिपोर्ट-रफत आलम
बरेली, 4 अक्टूबर। ग्यारहवीं शरीफ के मौके पर हर साल की तरह इस बार भी शहर में गौस-ए-पाक हजरत शेख अब्दुल कादिर जिलानी बगदादी रहमतुल्लाह अलैह की याद में जुलूस-ए-गौसिया निकलना था, लेकिन मौजूदा हालात को देखते हुए दरगाह से आपसी अमन और सौहार्द को बरकरार रखने के लिए फैसला लिया गया कि इस वर्ष जुलूस नहीं निकाला जाएगा।
अंजुमन गौसो रज़ा (टीटीएस) के तत्वावधान में सैलानी रज़ा चौक स्थित हाजी शरिक नूरी के आवास पर शांतिपूर्ण माहौल में महफ़िल-ए-गौसिया का आयोजन किया गया, जिसकी सदारत सज्जादानशीन व बानी-ए-जुलूस मुफ़्ती अहसन रज़ा क़ादरी (अहसन मियां) ने की।
सुबह नमाज़-ए-फज्र के बाद कुरानख्वानी से कार्यक्रम की शुरुआत हुई। दिन में महफ़िल का आग़ाज़ तिलावत-ए-कुरान से मुफ्ती अज़हर रज़ा ने किया। नात और मनक़बत का नजराना जमन रज़ा और मौलाना मुनीर रज़ा ने पेश किया।
अहसन मियां के आगमन पर अंजुमन के सदर हाजी शरिक नूरी ने फूलों से स्वागत किया और दस्तारबंदी की रस्म अदा की। इस दौरान मुफ्ती जईम रज़ा ने गौस-ए-पाक की करामात और उनकी शिक्षाओं पर रौशनी डालते हुए कहा
“शेख अब्दुल कादिर बगदादी ने सिखाया कि कितनी ही बड़ी मुश्किल आ जाए, हमें सच और सब्र का दामन नहीं छोड़ना चाहिए। इस्लाम अमन और इंसाफ का पैग़ाम देता है — न हम किसी पर जुल्म करें और न खुद पर जुल्म सहें।”
महफ़िल की निज़ामत मौलाना अज़हर रज़ा ने की। उन्होंने आला हज़रत का शेर पढ़ते हुए कहा
“ये दिल ये जिगर ये आँखे ये सिर जहाँ चाहो रखों कदम गौसे आज़म।”
कार्यक्रम के समापन पर मौलाना बिलाल रज़ा और हाफिज फुरकान रज़ा ने फातिहा पढ़ी, इसके बाद तोशा शरीफ की फातिहा और सामूहिक दुआ के साथ लंगर तकसीम किया गया।
इस मौके पर बड़ी संख्या में शहर के उलेमा और सामाजिक लोग मौजूद रहे, वामिक रज़ा, नासिर कुरैशी, अफजाल उद्दीन, जमाल ख़ान, ताहिर अल्वी, मंज़ूर खान, मुजाहिद रज़ा, वसीम रज़ा, हाजी फैयाज, फिरोज खान, शोएब रज़ा सहित कई लोग शामिल रहे।
अंजुमन गौसो रज़ा (टीटीएस) की ओर से यह संदेश दिया गया कि गौस-ए-पाक की शिक्षाएं अमन, इंसाफ और सब्र का पैग़ाम देती हैं। मौजूदा दौर में समाज को आपसी भाईचारे और शांति के साथ रहना चाहिए।