भूजल में घुला जानलेवा नाइट्रेट, सतत योजना में वित्तीय सहायता का अभाव
सांसद नीरज मौर्य ने लोकसभा में उठाए दो अहम मुद्दे, सरकार के जवाब में सामने आई जमीनी हकीकत
नई दिल्ली/बरेली। कृषि में रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध और असंतुलित प्रयोग से देश के कई हिस्सों में भूजल में नाइट्रेट प्रदूषण चिंताजनक स्तर तक पहुंच गया है। लोकसभा में सांसद नीरज मौर्य द्वारा उठाए गए प्रश्न के जवाब में केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय ने स्वीकार किया कि अत्यधिक उर्वरक उपयोग भूजल की गुणवत्ता को प्रभावित कर रहा है। सरकार ने बताया कि केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) नियमित रूप से भूजल की गुणवत्ता की निगरानी कर रहा है तथा नाइट्रेट प्रभावित क्षेत्रों की पहचान कर राज्यों के साथ जानकारी साझा की जा रही है।
मंत्रालय के अनुसार, नाइट्रेट प्रदूषण को कम करने के लिए मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना, प्राकृतिक खेती, भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति (बीपीकेपी) तथा जल शक्ति अभियान, जल संचय जन भागीदारी और मिशन अमृत सरोवर जैसी योजनाओं के माध्यम से भूजल संरक्षण और पुनर्भरण को बढ़ावा दिया जा रहा है। साथ ही देशभर में डिजिटल उपकरणों के माध्यम से भूजल निगरानी नेटवर्क का भी विस्तार किया जा रहा है।
सांसद नीरज मौर्य ने सरकार से पिछले पांच वर्षों के दौरान भूजल में नाइट्रेट स्तर, उर्वरकों के दुष्प्रभाव, भूजल निगरानी नेटवर्क के विस्तार तथा अत्यधिक दोहन वाले क्षेत्रों में पुनर्भरण की रणनीति को लेकर विस्तृत जानकारी मांगी थी। सरकार के जवाब से स्पष्ट हुआ कि भूजल प्रबंधन राज्य सरकारों का विषय होने के कारण केंद्र केवल तकनीकी मार्गदर्शन और योजनाओं के माध्यम से सहयोग करता है।
सतत योजना में बायो-गैस संयंत्रों को नहीं मिल रही सीधी वित्तीय सहायता
लोकसभा में सांसद नीरज मौर्य द्वारा उठाए गए एक अन्य प्रश्न के उत्तर में पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने बताया कि सतत (SATAT) योजना के तहत कंप्रेस्ड बायो-गैस (CBG) संयंत्र स्थापित करने के लिए केंद्र सरकार कोई प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता नहीं देती। यह योजना पूरी तरह उद्यमियों की तकनीकी एवं व्यावसायिक व्यवहार्यता पर आधारित है, जबकि तेल विपणन कंपनियां केवल गैस खरीद के लिए अभिरुचि आमंत्रण (EOI) जारी करती हैं।
सरकार के अनुसार 31 जुलाई 2026 तक देश में 217 सीबीजी संयंत्र चालू हो चुके हैं, जिनकी कुल उत्पादन क्षमता लगभग 1,773 टन प्रतिदिन है। इनमें उत्तर प्रदेश में 41 संयंत्र संचालित हैं। हालांकि भूमि संबंधी समस्याएं, कच्चे माल की उपलब्धता, वित्तीय कठिनाइयां, तकनीकी बाधाएं और पाइपलाइन कनेक्टिविटी जैसी समस्याओं के कारण कई परियोजनाएं अभी भी पूरी नहीं हो सकी हैं।
मंत्रालय ने बताया कि इन चुनौतियों के समाधान के लिए समय-समय पर तेल एवं गैस विपणन कंपनियों, सीबीजी उत्पादकों और अन्य हितधारकों के साथ समीक्षा बैठकें की जाती हैं। साथ ही डेवलपमेंट ऑफ पाइपलाइन इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) योजना के माध्यम से पात्र परियोजनाओं को पाइपलाइन कनेक्टिविटी उपलब्ध कराने की व्यवस्था भी की जा रही है।
सांसद नीरज मौर्य ने प्रश्न के माध्यम से यह मुद्दा उठाया कि यदि सरकार ग्रामीण रोजगार, पराली प्रबंधन और स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देना चाहती है तो बायो-गैस संयंत्रों के लिए वित्तीय सहायता, पाइपलाइन कनेक्टिविटी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को अधिक सरल और प्रभावी बनाना आवश्यक होगा। सरकार के जवाब से यह भी स्पष्ट हुआ कि वर्तमान व्यवस्था में निजी निवेशकों को अधिकांश वित्तीय और व्यावसायिक जोखिम स्वयं उठाने पड़ रहे हैं।
भूजल में घुला जानलेवा नाइट्रेट
फसलों में बेहिसाब उर्वरक के इस्तेमाल से भूगर्भ जल जहरीला, संसद में उठा मुद्दा
देश भर में कृषि क्षेत्र में रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक और असंतुलित इस्तेमाल के कारण भूजल में नाइट्रेट प्रदूषण का स्तर खतरनाक सीमा तक पहुंच गया है, जिससे ग्रामीण आबादी के स्वास्थ्य और पर्यावरण पर गंभीर संकट मंडरा रहा है। केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय द्वारा संसद में पेश किए गए जवाब के अनुसार, सरकार ने माना है कि फसलों में अत्यधिक उर्वरक प्रयोग से भूजल की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। इस स्थिति से निपटने के लिए केंद्र सरकार मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना, प्राकृतिक खेती और डिजिटल वॉटर लेवल रिकॉर्डर जैसे डिजिटल उपकरणों के जरिए निगरानी और पुनर्भरण के प्रयास कर रही है।
सांसद नीरज मौर्य द्वारा लोकसभा में पूछे गए इस प्रश्न से कृषि पद्धतियों और भूजल प्रबंधन में चली आ रही बड़ी नीतिगत और तकनीकी विसंगतियों का उजागर हुआ है। सांसद के इस हस्तक्षेप से स्पष्ट हुआ कि केंद्रीय स्तर पर 24,000 से अधिक डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम और जल संचयन अभियानों के बावजूद जमीनी स्तर पर उर्वरकों के अंधाधुंध उपयोग पर कोई प्रभावी रोक नहीं लग पा रही है। इसके अलावा, भूजल प्रबंधन पूरी तरह राज्य का विषय होने के कारण केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय की कमी सामने आई है, जिससे दूषित जल से प्रभावित क्षेत्रों में समय रहते ठोस उपचारात्मक कदम उठाने की गति काफी धीमी बनी हुई है।
कागजों में हरित क्रांति, जमीन पर शून्य सहायता
सतत योजना में बायो-गैस संयंत्रों को नहीं मिली सीधी वित्तीय मदद
देश में स्वच्छ ईंधन और पराली प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिए संचालित सतत पहल के तहत कंप्रेस्ड बायो-गैस संयंत्र स्थापित करने के लिए केंद्र सरकार की ओर से कोई सीधी वित्तीय सहायता प्रदान नहीं की जा रही है। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय द्वारा संसद में दिए गए उत्तर के अनुसार, यह योजना पूरी तरह उद्यमियों की व्यावसायिक व्यवहार्यता पर आधारित है और तेल विपणन कंपनियां केवल गैस खरीद का समझौता करती हैं। 31 जुलाई 2026 तक देश भर में 217 सीबीजी प्लांट चालू किए गए हैं, जिनमें उत्तर प्रदेश में 41 संयंत्र स्थापित हैं, लेकिन भूमि अधिग्रहण, कच्चे माल की उपलब्धता और वित्तीय अड़चनों के कारण दर्जनों परियोजनाएं अधर में लटकी हुई हैं।
लोकसभा में सांसद नीरज मौर्य द्वारा उठाए गए इस प्रश्न से सतत योजना की जमीनी हकीकत और प्रशासनिक विसंगतियों का पर्दाफाश हुआ है। सांसद के इस सवाल से यह उजागर हुआ कि एक तरफ जहां सरकार ग्रामीण युवाओं के लिए रोजगार और पराली प्रबंधन के बड़े दावे कर रही है, वहीं दूसरी ओर सीधी वित्तीय सहायता के अभाव और तेल कंपनियों द्वारा गैस आपूर्ति समझौतों व पाइपलाइन कनेक्टिविटी में हो रही अत्यधिक प्रशासनिक देरी से निजी निवेशक संयंत्र लगाने से कतरा रहे हैं।
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