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वॉइस कॉल से चलेगा डिजिटल इंडिया? सांसद नीरज मौर्य के सवाल ने सरकार की संवेदनशीलता पर खड़े किए तीखे सवाल

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वॉइस कॉल से चलेगा डिजिटल इंडिया? सांसद नीरज मौर्य के सवाल ने सरकार की संवेदनशीलता पर खड़े किए तीखे सवाल

रिपोर्ट/राजेश कुमार 

लोकसभा में सांसद नीरज मौर्य द्वारा इंटरनेट बंदी को लेकर पूछे गए सवाल ने केंद्र सरकार की डिजिटल सोच और ज़मीनी हकीकत के बीच गहरी खाई को उजागर कर दिया है। कानून-व्यवस्था के नाम पर बार-बार इंटरनेट सेवाएं निलंबित किए जाने से आम नागरिकों को हो रही भारी परेशानियों पर सरकार का जवाब न केवल गोलमोल रहा, बल्कि चिंताजनक भी।

सांसद नीरज मौर्य ने छात्रों, व्यापारियों, नौकरीपेशा लोगों, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं और ऑनलाइन कामकाज से जुड़े करोड़ों नागरिकों की समस्याओं को सदन में उठाया। इसके जवाब में सरकार ने कहा कि इंटरनेट बंदी के दौरान वॉइस कॉल और एसएमएस सेवाएं चालू रहती हैं ताकि लोग संपर्क में रह सकें। इस उत्तर ने एक बुनियादी सवाल खड़ा कर दिया—क्या वॉइस कॉल और एसएमएस आज के डिजिटल युग में इंटरनेट का विकल्प हो सकते हैं?

हकीकत यह है कि आज इंटरनेट जीवन की लाइफलाइन बन चुका है। बिना इंटरनेट न रेल और फ्लाइट टिकट बुक हो सकते हैं, न बैंकिंग या यूपीआई भुगतान संभव है, न ऑनलाइन पढ़ाई चल सकती है और न ही डिजिटल ऑफिस वर्क। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्र हों या मल्टीनेशनल कंपनियों में काम करने वाले कर्मचारी—सभी का काम सीधे इंटरनेट पर निर्भर है। ऐसे में सिर्फ वॉइस कॉल और एसएमएस की दुहाई देना आम नागरिकों की परेशानियों का मज़ाक उड़ाने जैसा है।

सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आया कि केंद्र सरकार के पास पिछले पांच वर्षों में इंटरनेट बंदी से हुए आर्थिक नुकसान का कोई भी आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। यानी करोड़ों लोगों की पढ़ाई, व्यापार और रोज़गार प्रभावित होने के बावजूद सरकार ने न तो नुकसान का आकलन किया और न ही उसकी कोई जवाबदेही तय की।

सांसद नीरज मौर्य ने साफ कहा कि सरकार नियमों का हवाला देकर जवाब दे रही है, लेकिन जनता की वास्तविक समस्याओं के समाधान के लिए कोई ठोस नीति सामने नहीं आ रही। यह भी गंभीर सवाल है कि क्या अन्य लोकतांत्रिक देशों में कानून-व्यवस्था के नाम पर इस तरह बार-बार इंटरनेट बंद किया जाता है?

डिजिटल युग में इंटरनेट कोई विलासिता नहीं, बल्कि बुनियादी ज़रूरत है। जब सरकार “डिजिटल इंडिया” की बात करती है, तब बार-बार इंटरनेट बंद करना उसी सोच पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। अब वक्त आ गया है कि इंटरनेट निलंबन को अंतिम विकल्प माना जाए और हर ऐसे फैसले से पहले उसके सामाजिक और आर्थिक असर की गंभीर समीक्षा की जाए—वरना “डिजिटल देश” का सपना सिर्फ भाषणों तक ही सिमट कर रह जाएगा।

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