मकर संक्रांति 15 जनवरी को क्यों? वर्षों बाद तारीख बदलने के पीछे का वैज्ञानिक और धार्मिक रहस्य

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मकर संक्रांति 15 जनवरी को क्यों? वर्षों बाद तारीख बदलने के पीछे का वैज्ञानिक और धार्मिक रहस्य

🖋️ सत्य प्रकाश

खबर:

भारतीय परंपरा में मकर संक्रांति केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि सूर्य की खगोलीय यात्रा से जुड़ा अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है। आमतौर पर यह पर्व 14 जनवरी को मनाया जाता रहा है, लेकिन इस वर्ष मकर संक्रांति 15 जनवरी को पड़ने से लोगों के मन में स्वाभाविक सवाल उठ रहे हैं—आख़िर वर्षों बाद इसकी तारीख़ आगे क्यों खिसक गई?

दरअसल, मकर संक्रांति चंद्र पंचांग पर नहीं, बल्कि सौर गणना पर आधारित पर्व है। यह उस दिन मनाई जाती है जब सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करता है। इसी क्षण को सूर्य का उत्तरायण होना कहा जाता है, जब सूर्य की गति दक्षिणायन से उत्तरायण मानी जाती है और दिन धीरे-धीरे बड़े होने लगते हैं। शास्त्रों में इसे शुभ काल की शुरुआत माना गया है।

हर साल 14 जनवरी ही क्यों नहीं?

इसका उत्तर खगोलीय गणनाओं में छिपा है। पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा लगभग 365 दिन, 5 घंटे, 48 मिनट और 46 सेकंड में पूरी करती है, जबकि हमारे सामान्य कैलेंडर वर्ष में केवल 365 दिन होते हैं। इस अतिरिक्त समय को संतुलित करने के लिए हर चार वर्ष में लीप ईयर जोड़ा जाता है, लेकिन यह व्यवस्था भी पूरी तरह सटीक नहीं है।

इसके साथ ही भारतीय पंचांग सायन पद्धति पर आधारित है, जिसमें सूर्य की स्थिति नक्षत्रों के सापेक्ष तय की जाती है। पृथ्वी की धुरी में होने वाले सूक्ष्म बदलाव—जिसे वैज्ञानिक भाषा में Precession of Equinoxes (अयनांश) कहा जाता है—के कारण सूर्य के राशि परिवर्तन का समय धीरे-धीरे आगे खिसकता रहता है। यही वजह है कि कई दशकों के अंतराल के बाद मकर संक्रांति की तारीख 14 जनवरी से बढ़कर 15 जनवरी हो जाती है।

सरल शब्दों में कहें तो, समय की यह अतिरिक्त खगोलीय “बचत” वर्षों तक जुड़ती रहती है और एक निश्चित अवधि के बाद तारीख़ में एक दिन का बदलाव साफ़ दिखाई देने लगता है।

धार्मिक महत्व बरकरार

धार्मिक दृष्टि से मकर संक्रांति को देवताओं का दिन और शुभ कार्यों की शुरुआत का प्रतीक माना गया है। इस दिन गंगा स्नान, दान-पुण्य, तिल-गुड़ का सेवन और सूर्य उपासना का विशेष महत्व है। तिथि में परिवर्तन भले ही हो, लेकिन पर्व का भाव वही रहता है—अंधकार से प्रकाश की ओर, जड़ता से गति की ओर।

इस प्रकार मकर संक्रांति का 15 जनवरी को मनाया जाना कोई भ्रम या मनमाना निर्णय नहीं, बल्कि खगोलीय गणनाओं और सौर सिद्धांतों का स्वाभाविक परिणाम है। यह तथ्य एक बार फिर सिद्ध करता है कि भारतीय पर्व केवल आस्था नहीं, बल्कि गहरे वैज्ञानिक आधार पर टिके हुए हैं।

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Author: Bhaskar News 24

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