अतिपिछड़ा और महादलित वर्ग को अलग आरक्षण देने की उठी मांग
सामाजिक न्याय पार्टी ने राष्ट्रपति के नाम सौंपा ज्ञापन, राजनीतिक हिस्सेदारी और मुफ्त शिक्षा की भी मांग
रिपोर्ट सत्य प्रकाश
बरेली। सामाजिक न्याय पार्टी ने अतिपिछड़ा और महादलित वर्गों को अलग आरक्षण देने की मांग को लेकर आवाज बुलंद की है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सोनू कश्यप के नेतृत्व में कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रपति महोदया के नाम संबोधित ज्ञापन प्रशासनिक अधिकारियों को सौंपा। ज्ञापन में कहा गया कि वर्तमान आरक्षण व्यवस्था का लाभ पिछड़े और दलित वर्गों की सभी जातियों तक समान रूप से नहीं पहुंच पा रहा है, जिसके कारण कई कमजोर और वंचित समुदाय आज भी विकास की मुख्यधारा से दूर हैं।
पार्टी नेताओं ने कहा कि संविधान निर्माता बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने संविधान के अनुच्छेद 340 के तहत पिछड़े वर्गों की सामाजिक और शैक्षिक स्थिति का अध्ययन कराने के लिए आयोग गठित करने का प्रावधान किया था। इसके बाद काका कालेलकर आयोग, मंडल आयोग, सामाजिक न्याय समिति, जस्टिस रोहिणी आयोग और उत्तर प्रदेश की राघवेन्द्र कमेटी समेत कई आयोगों और समितियों ने अपनी रिपोर्ट में यह माना कि पिछड़े और दलित वर्गों के भीतर कुछ जातियां आरक्षण का पूरा लाभ नहीं ले पा रही हैं।
ज्ञापन में आरोप लगाया गया कि आयोगों की रिपोर्ट और सिफारिशों के बावजूद उत्तर प्रदेश में अतिपिछड़े वर्गों को अलग आरक्षण देने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। पार्टी नेताओं ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनुसूचित जाति और जनजाति आरक्षण के वर्गीकरण को लेकर दिए गए फैसले के बाद हरियाणा सरकार ने इस दिशा में पहल की है, इसलिए उत्तर प्रदेश सरकार को भी अतिपिछड़ा और महादलित वर्गों के लिए अलग व्यवस्था लागू करनी चाहिए।
सामाजिक न्याय पार्टी ने मांग की कि अतिपिछड़ा एवं महादलित वर्गों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में अलग आरक्षण दिया जाए। साथ ही पंचायत, नगर निकाय, विधानसभा और लोकसभा तक राजनीतिक आरक्षण सुनिश्चित किया जाए। ज्ञापन में प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक निशुल्क शिक्षा देने तथा इन वर्गों पर होने वाले शोषण और अत्याचार को रोकने के लिए एससी-एसटी एक्ट की तर्ज पर अलग कानून बनाने की मांग भी शामिल रही।
इसके अलावा पार्टी ने वर्ष 1891 की जनगणना के आधार पर महार/तुरैहा जाति को सरकारी अभिलेखों में दर्ज करने की मांग उठाई। पार्टी नेताओं का कहना था कि जब तक समाज के कमजोर और वंचित वर्गों को अलग पहचान और बराबरी की भागीदारी नहीं मिलेगी, तब तक सामाजिक न्याय का सपना अधूरा रहेगा।
