मन की खामोश उधेड़-बुन की संवेदनशील अभिव्यक्ति है आमोद कुमार श्रीवास्तव की पुस्तक ‘उधेड़-बुन’
रिपोर्ट/शुभांशु वैश्य
लखनऊ।
‘उधेड़-बुन’ कोई साधारण पुस्तक नहीं, बल्कि उन अनकहे भावों की सजीव अभिव्यक्ति है, जो हर संवेदनशील मन के भीतर चुपचाप धड़कते रहते हैं। आमोद कुमार श्रीवास्तव की यह कृति पढ़ते हुए पाठक को ऐसा अनुभव होता है मानो कोई अपना बेहद करीब बैठकर, धीमे और आत्मीय स्वर में जीवन की उलझनों, सवालों और अनुभूतियों की बात कर रहा हो।
यह पुस्तक जीवन के उन क्षणों को शब्द देती है, जब मन उलझा होता है, प्रश्न भारी लगते हैं और उत्तर मौन के भीतर कहीं छिपे रहते हैं। लेखक जीवन को सजाकर नहीं, बल्कि पूरी ईमानदारी से स्वीकार कर प्रस्तुत करते हैं। कोविड जैसी कठिन परिस्थितियों की पृष्ठभूमि पुस्तक को और अधिक मानवीय बना देती है—जहाँ बिछोह, भय और असहायता है, लेकिन इसके साथ ही भीतर कहीं टिके रहने की एक शांत, अडिग इच्छा भी जीवित रहती है। यहाँ पीड़ा शोर नहीं मचाती, बल्कि समझ और संवेदना बनकर बहती है।
‘उधेड़-बुन’ की भाषा इसकी सबसे बड़ी ताकत है—सरल, कोमल और आत्मीय। शब्द बोझ नहीं बनते, बल्कि पाठक का हाथ पकड़कर उसके साथ चलते हैं। गुरुजनों, माता-पिता और जीवन को दिशा देने वाले व्यक्तियों के प्रति व्यक्त कृतज्ञता पाठक के मन को गहराई से स्पर्श करती है। पुस्तक का ‘समर्पण’ और भूमिका यह स्पष्ट कर देते हैं कि यह लेखन अहंकार से नहीं, बल्कि संवेदना और ऋणबोध से उपजा है।
क्यों हर व्यक्ति को ‘उधेड़-बुन’ पढ़नी चाहिए:
– क्योंकि यह पुस्तक पाठक को अकेला महसूस नहीं होने देती।
– क्योंकि यह भीतर चल रही मानसिक उधेड़-बुन को शब्दों की पहचान देती है।
– क्योंकि यह कठिन समय में टूटे मन को चुपचाप थाम लेती है।
– क्योंकि यह उपदेश नहीं देती, बस साथ चलती है।
निष्कर्षतः, ‘उधेड़-बुन’ हर उस व्यक्ति के लिए है जिसने कभी चुपचाप रोया है, जिसने सवालों के साथ जीना सीखा है और जिसने जीवन को गहराई से महसूस करना चाहा है। यह पुस्तक पढ़कर समाप्त नहीं होती, बल्कि पाठक के मन में सुकून की तरह ठहर जाती है।
यदि आप चाहते हैं कि कोई पुस्तक आपको समझे, आपके भावों को आवाज़ दे और भीतर से थोड़ा हल्का कर दे—तो आमोद कुमार श्रीवास्तव की ‘उधेड़-बुन’ अवश्य पढ़ें।