*आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य जाति के छात्रों के हक पर लोकसभा में खुला अधूरा सच, मोदी सरकार के पास जिलावार आंकड़े तक नहीं ।*
बरेली। आंवला-बरेली लोकसभा क्षेत्र से समाजवादी पार्टी के सांसद नीरज मौर्य ने संसद के मानसून सत्र में आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग (EWS) के छात्रों के हितों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मुद्दे को लोकसभा में मजबूती से उठाया। सांसद ने देश के शैक्षणिक संस्थानों में ईडब्ल्यूएस श्रेणी के तहत आरक्षण, प्रवेश प्रक्रिया, जिलावार दाखिलों तथा पारदर्शिता सुनिश्चित करने वाले निगरानी तंत्र को लेकर केंद्र सरकार से कई महत्वपूर्ण सवाल पूछे।
सांसद नीरज मौर्य ने सरकार से यह जानना चाहा कि ईडब्ल्यूएस श्रेणी के तहत प्रवेश के लिए पात्रता के मानदंड क्या हैं, क्या सभी सरकारी, गैर-सरकारी और निजी शिक्षण संस्थानों में इस श्रेणी के तहत प्रवेश अनिवार्य है, पिछले पांच वर्षों में राज्यवार और जिलावार कितने छात्रों को प्रवेश मिला तथा सरकार ने पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए कौन-सा निगरानी तंत्र विकसित किया है। विशेष रूप से उन्होंने मुरादाबाद, बरेली, बदायूं, शाहजहांपुर, मेरठ, नोएडा और गाजियाबाद जिलों के आंकड़े भी मांगे।
सरकार की ओर से दिए गए उत्तर में शिक्षा को समवर्ती सूची का विषय बताते हुए विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता का हवाला दिया गया, लेकिन राज्यवार अथवा जिलावार रिक्त सीटों, वास्तविक प्रवेशों और निगरानी व्यवस्था का कोई स्पष्ट एवं पारदर्शी विवरण उपलब्ध नहीं कराया गया। इससे यह सवाल खड़ा होता है कि सरकार के पास योजना के जमीनी क्रियान्वयन की प्रभावी निगरानी का कोई ठोस तंत्र है भी या नहीं।
सरकार ने अपने उत्तर में यह अवश्य बताया कि ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन (AISHE) के अनुसार वर्ष 2020-21 में ईडब्ल्यूएस छात्रों का नामांकन 4.68 लाख था, जो वर्ष 2023-24 में बढ़कर 8.99 लाख हो गया है। साथ ही केंद्रीय शिक्षण संस्थानों में अतिरिक्त सीटों के सृजन के लिए 4315.15 करोड़ रुपये स्वीकृत किए जाने की जानकारी भी दी गई। हालांकि निजी एवं गैर-सरकारी संस्थानों में ईडब्ल्यूएस आरक्षण के प्रभावी अनुपालन और संभावित अनियमितताओं पर सरकार ने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया।
इस विषय पर सांसद नीरज मौर्य ने कहा कि यदि सरकार गरीब छात्रों के लिए बजट और आरक्षण का दावा करती है तो यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि पात्र छात्रों को वास्तव में उनके अधिकार की सीटें मिल रही हैं या नहीं। उन्होंने कहा कि ईडब्ल्यूएस आरक्षण व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए सरकार को प्रभावी निगरानी तंत्र विकसित करना चाहिए, ताकि इस योजना का लाभ वास्तव में जरूरतमंद विद्यार्थियों तक पहुंच सके।
आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य जाति के छात्रों के हक पर लोकसभा में खुला अधूरा सच, सरकार के पास जिलावार आंकड़े तक नहीं
बरेली। आंवला-बरेली लोकसभा क्षेत्र से समाजवादी पार्टी के सांसद नीरज मौर्य ने संसद के मानसून सत्र में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के छात्रों के हितों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मुद्दे को लोकसभा में मजबूती से उठाया। सांसद ने देश के शैक्षणिक संस्थानों में ईडब्ल्यूएस श्रेणी के तहत आरक्षण, प्रवेश प्रक्रिया, जिलावार दाखिलों तथा पारदर्शिता सुनिश्चित करने वाले निगरानी तंत्र को लेकर केंद्र सरकार से कई महत्वपूर्ण सवाल पूछे।
सांसद नीरज मौर्य ने सरकार से यह जानना चाहा कि ईडब्ल्यूएस श्रेणी के तहत प्रवेश के लिए पात्रता के मानदंड क्या हैं, क्या सभी सरकारी, गैर-सरकारी और निजी शिक्षण संस्थानों में इस श्रेणी के तहत प्रवेश अनिवार्य है, पिछले पांच वर्षों में राज्यवार और जिलावार कितने छात्रों को प्रवेश मिला तथा सरकार ने पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए कौन-सा निगरानी तंत्र विकसित किया है। विशेष रूप से उन्होंने मुरादाबाद, बरेली, बदायूं, शाहजहांपुर, मेरठ, नोएडा और गाजियाबाद जिलों के आंकड़े भी मांगे।
सरकार की ओर से दिए गए उत्तर में शिक्षा को समवर्ती सूची का विषय बताते हुए विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता का हवाला दिया गया, लेकिन राज्यवार अथवा जिलावार रिक्त सीटों, वास्तविक प्रवेशों और निगरानी व्यवस्था का कोई स्पष्ट एवं पारदर्शी विवरण उपलब्ध नहीं कराया गया। इससे यह सवाल खड़ा होता है कि सरकार के पास योजना के जमीनी क्रियान्वयन की प्रभावी निगरानी का कोई ठोस तंत्र है भी या नहीं।
सरकार ने अपने उत्तर में यह अवश्य बताया कि ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन (AISHE) के अनुसार वर्ष 2020-21 में ईडब्ल्यूएस छात्रों का नामांकन 4.68 लाख था, जो वर्ष 2023-24 में बढ़कर 8.99 लाख हो गया है। साथ ही केंद्रीय शिक्षण संस्थानों में अतिरिक्त सीटों के सृजन के लिए 4315.15 करोड़ रुपये स्वीकृत किए जाने की जानकारी भी दी गई। हालांकि निजी एवं गैर-सरकारी संस्थानों में ईडब्ल्यूएस आरक्षण के प्रभावी अनुपालन और संभावित अनियमितताओं पर सरकार ने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया।
इस विषय पर सांसद नीरज मौर्य ने कहा कि यदि सरकार गरीब छात्रों के लिए बजट और आरक्षण का दावा करती है तो यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि पात्र छात्रों को वास्तव में उनके अधिकार की सीटें मिल रही हैं या नहीं। उन्होंने कहा कि ईडब्ल्यूएस आरक्षण व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए सरकार को प्रभावी निगरानी तंत्र विकसित करना चाहिए, ताकि इस योजना का लाभ वास्तव में जरूरतमंद विद्यार्थियों तक पहुंच सके।