नगर निगम बरेली में हुक्मरानों को ठेंगा!
फिरोज खान/यूपी हेड
ब्यूरो रिपोर्ट/हैदर अली
शासन के आदेशों की धज्जियां उड़ाकर कुर्सी पर जमे हैं अभियंता अजीत कुमार
ठेकेदारों की मिलीभगत से चल रहा है भ्रष्टाचार का खेल, पदोन्नति के बाद भी नहीं हुए कार्यमुक्त
बरेली। उत्तर प्रदेश सरकार भले ही “भ्रष्टाचार मुक्त शासन” का दावा करे, मगर नगर निगम बरेली में हालात बिल्कुल उलट हैं। यहां शासन के आदेशों को खुलेआम ठेंगा दिखाते हुए सहायक अभियंता (जल) अजीत कुमार आज भी कुर्सी पर डटे हुए हैं जबकि उनका स्थानांतरण और पदोन्नति झांसी के लिए 17 अक्टूबर 2025 को ही हो चुकी है।
शासन के नगर विकास विभाग के प्रमुख सचिव गुरु प्रसाद ने सभी नगर आयुक्तों को स्पष्ट आदेश दिया था कि जिन अधिकारियों का पदोन्नति के साथ ट्रांसफर हुआ है, उन्हें तुरंत कार्यमुक्त किया जाए। मगर बरेली नगर निगम के अफसरों ने इस आदेश को ठंडे बस्ते में डाल दिया। सवाल उठ रहा है क्या किसी बड़े संरक्षण की वजह से अजीत कुमार की कुर्सी बची हुई है?
दीपावली से पहले करोड़ों का खेल!
सूत्रों के मुताबिक, अजीत कुमार ने दीपावली से ठीक पहले तीन फर्मों को लगभग ढाई करोड़ रुपये का भुगतान करवाया। आरोप है कि इन फर्मों में उनकी साझेदारी और अप्रत्यक्ष स्वामित्व है। इन फर्मों के फर्जी अनुभव प्रमाणपत्र भी चर्चा में हैं।
इतना ही नहीं, नगर निगम के बोर्ड ने अजीत कुमार को बरेली में रोकने का प्रस्ताव शासन को भेजा था, जिसे शासन ने स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया। बावजूद इसके, अजीत कुमार अब भी बरेली में जमे हुए हैं और अपने रसूख के दम पर सिस्टम को ठेंगा दिखा रहे हैं।
शिकायत मुख्यमंत्री तक पहुंची
सुभाषनगर की नई बस्ती निवासी राजवीर सिंह ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र भेजकर निष्पक्ष जांच और मुकदमा दर्ज करने की मांग की है।
उन्होंने आरोप लगाया कि यदि जांच निष्पक्ष हुई, तो कई बड़े नाम इस भ्रष्टाचार की फेहरिस्त में सामने आएंगे।
कुर्सी बचाने में ठेकेदारों की भूमिका
नगर निगम से जुड़े सूत्रों के अनुसार, अजीत कुमार की कुर्सी अब तक बची है तो उसके पीछे कुछ प्रभावशाली ठेकेदारों की मिलीभगत है।
बताया जा रहा है कि इन ठेकेदारों को करोड़ों के भुगतान के बाद अजीत कुमार से गहरे संबंध हैं और वही सिस्टम में उनके लिए ढाल बनकर खड़े हैं।
शासनादेश की खुली अवहेलना
शासन का स्पष्ट आदेश होने के बावजूद किसी अधिकारी की हिम्मत नहीं कि अजीत कुमार को कार्यमुक्त कर सके। यह न केवल प्रशासनिक लापरवाही है, बल्कि भ्रष्टाचार की खुली पैरवी भी।
लोगों का सवाल है जब मुख्यमंत्री स्वयं भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त हैं, तो बरेली नगर निगम में कार्रवाई की रफ्तार इतनी सुस्त क्यों है?




