ज्योतिषाचार्य डॉ. मंजू जोशी ने दी जानकारी: 1 नवंबर को रखा जाएगा अहोई अष्टमी का व्रत, जानिए पूजन विधि और शुभ मुहूर्त
हल्द्वानी। संतान की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की मंगलकामना का पावन पर्व अहोई अष्टमी इस वर्ष 1 नवंबर 2026, रविवार को श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ मनाया जाएगा। ज्योतिषाचार्य डॉ. मंजू जोशी ने जानकारी देते हुए बताया कि कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाने वाला यह व्रत सनातन संस्कृति में विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व रखता है।
उन्होंने बताया कि इस दिन माताएं अपनी संतान के सुखी जीवन, आरोग्य और दीर्घायु की कामना के लिए व्रत रखकर अहोई माता एवं भगवती पार्वती की पूजा-अर्चना करती हैं। अहोई अष्टमी को मातृ शक्ति, त्याग, समर्पण और संतान के प्रति अटूट वात्सल्य का प्रतीक माना जाता है।
शास्त्रीय महत्व
ज्योतिषाचार्य डॉ. मंजू जोशी के अनुसार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को आने वाले इस उपवास का उल्लेख विभिन्न पौराणिक ग्रंथों और सनातन परंपराओं में मिलता है। अहोई माता को भगवती पार्वती का स्वरूप माना जाता है, जो संतान की रक्षा करने वाली और उनके जीवन के कष्टों का निवारण करने वाली देवी हैं।
उन्होंने बताया कि अहोई अष्टमी व्रत का मुख्य उद्देश्य संतान के जीवन में आने वाले संकटों से रक्षा, उनके उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु की मंगलकामना करना है। इस दिन कई माताएं श्रद्धा और परंपरा के अनुसार दिनभर उपवास रखती हैं तथा संध्याकाल में अहोई माता की पूजा करती हैं।
पौराणिक कथा और व्रत की शुरुआत
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार प्राचीन काल में एक साहूकार की पत्नी मिट्टी खोदते समय अनजाने में सेही के बच्चे को नुकसान पहुंचा बैठी थी। इसके बाद उसके परिवार पर दुखों का दौर शुरू हो गया और उसकी संतानों के जीवन पर संकट आने लगा।
दुखी साहूकारिन ने विद्वानों की शरण ली। विद्वानों ने उसे कार्तिक कृष्ण अष्टमी के दिन भगवती अहोई की पूजा करने और नियमपूर्वक उपवास रखने की सलाह दी। मान्यता है कि साहूकारिन ने श्रद्धा और विधि-विधान से व्रत एवं पूजा की, जिससे माता अहोई प्रसन्न हुईं और उसकी संतानों को दीर्घायु का आशीर्वाद प्राप्त हुआ।
इसी मान्यता के आधार पर संतान की रक्षा, सुख और मंगलकामना के लिए अहोई अष्टमी का व्रत रखने की परंपरा प्रचलित हुई।
उत्तर भारत में विशेष श्रद्धा से मनाया जाता है पर्व
अहोई अष्टमी का यह पावन व्रत मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा और बिहार सहित उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में विशेष श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ मनाया जाता है। अब उत्तराखंड के भी कई क्षेत्रों में माताएं अपनी संतान की दीर्घायु और मंगलकामना के लिए इस व्रत को श्रद्धापूर्वक रखती हैं।
विशेषकर मथुरा के राधाकुंड में इस दिन स्नान और अहोई माता की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है।
जानिए अहोई अष्टमी की पूजन विधि
ज्योतिषाचार्य डॉ. मंजू जोशी के अनुसार अहोई अष्टमी के दिन प्रातःकाल ब्रह्म बेला में उठकर नित्य कर्म से निवृत्त होने के बाद स्नानादि किया जाता है और व्रत का संकल्प लिया जाता है।
संध्याकाल में पूजा के लिए विशेष तैयारी की जाती है। परंपरा के अनुसार दीवार पर गेरू से अहोई माता, उनके पुत्रों और सेही का चित्र बनाया जाता है अथवा अहोई माता के चित्र या कैलेंडर की स्थापना कर पूजन किया जाता है।
इसके बाद जल से भरा कलश स्थापित किया जाता है और रोली, अक्षत, दूध, भोग, फूल, फल, पान-सुपारी और पंचमेवा आदि अर्पित किए जाते हैं। पूजा के दौरान अहोई अष्टमी की कथा सुनी जाती है।
रात्रि में तारों के दर्शन के बाद उन्हें अर्घ्य देकर आरती की जाती है। इसके पश्चात परंपरा और पारिवारिक रीति-रिवाजों के अनुसार व्रत का पारण किया जाता है।
स्याऊ (अहोई) माला की विशेष परंपरा
अहोई अष्टमी के पूजन में चांदी की स्याऊ अथवा अहोई माला का भी विशेष महत्व माना जाता है। कई परिवारों में प्रत्येक संतान के नाम से अथवा हर वर्ष इस माला में चांदी के मनके बढ़ाने की परंपरा है।
पूजा के दौरान तारों को अर्घ्य देने के बाद इस माला को रोली और अक्षत से पूजकर धारण किया जाता है। दीपावली और गोवर्धन पूजा के बाद इसे सुरक्षित रख दिया जाता है।
अहोई अष्टमी का शुभ मुहूर्त
अष्टमी तिथि प्रारंभ:
1 नवंबर 2026, अपराह्न 02:51 बजे से
अष्टमी तिथि समाप्त:
2 नवंबर 2026, अपराह्न 01:11 बजे तक
पूजा का शुभ मुहूर्त:
1 नवंबर 2026 को सायं 05:36 बजे से सायं 06:54 बजे तक
तारों को अर्घ्य देने का समय:
सायं 06:00 बजे के बाद, तारों के दर्शन के अनुसार।
इस मंत्र का करें जाप
पूजा के समय माता अहोई और भगवती पार्वती का ध्यान करते हुए इस मंत्र का जाप शुभ एवं फलदायी माना जाता है—
नमस्तेष्टेश्वरि भद्र्ये सर्वपापहरा हरे।
पुत्रान् देहि महाभागे त्वां वयं शरणं गताः॥
ज्योतिषाचार्य डॉ. मंजू जोशी ने सभी श्रद्धालुओं को अहोई अष्टमी पर्व की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि यह पावन पर्व मातृ शक्ति, श्रद्धा और संतान के प्रति प्रेम एवं समर्पण का प्रतीक है। उन्होंने सभी के परिवारों में सुख, शांति, समृद्धि और बच्चों के उत्तम स्वास्थ्य व दीर्घायु की मंगलकामना की।
ज्योतिषाचार्य डॉ. मंजू जोशी
वैदिक ज्योतिष एवं वास्तु विशेषज्ञ
मोबाइल: 8395806256



